लबोटा बीटेक हाज़िर है अपने वही पुराने टपोरी अंदाज़ में। भैय्या बात ही कुछ ऐसी है कि हमको अपना सारा काम छोड़कर आप लोगों से बतियाने आना पड़ा। आपने सुना कुछ ? अरे वही कि हमारी भारत सरकार खिचड़ी को विश्वस्तर पर अपना “ब्रांड इंडिया” फ़ूड बनाने जा रही है। चार नवम्बर यानि कि ख़ास गंगा स्नान के दिन इसकी घोषणा आधिकारिक रूप से होगी। बहुत ही ख़ुशी की बात है। अब तक हम अपनी रसोई से चूहे भगा कर उन्हें पड़ोसी की रसोई में भेज देते थे। पहली बार हमने अपनी रसोई की खिचड़ी को दुसरे मुल्कों की रसोई में भेजने का महान कार्य करने का निर्णय लिया है।

अपनी खिचड़ी की तो बात ही अलग है। अचानक घर में मेहमानों का जमावड़ा लग जाए तो खिचड़ी।  मम्मी , पापा से लड़कर मायके चली जाये तो खिचड़ी।  कभी पेट ख़राब हो तो खिचड़ी।  बीवी का खाना बनाने का मन ना हो तो खिचड़ी।  यारी , दोस्ती, इंसानियत ये सब तो कहने की बातें हैं।  असली साथ तो खिचड़ी निभाती है।  खिचड़ी हमारी सुख दुःख की साथी है। रंग बिरंगे देश का खाना भी अलग अलग रंगों का।  कभी काली दाल की खिचड़ी , कभी पीली खिचड़ी , कभी पचरंगी खिचड़ी तो कभी सतरंगी। खिचड़ी है तो हमारे जीवन में रंग हैं।

वो लड़के जो अकेले हैं और वो लड़कियां जो खाना बनाने की चोर हैं वो कब से खिचड़ी को डेट कर रहे हैं। उनमें से कुछ तो हफ्ते में तीन चार बार खिचड़ी से मुलाकात कर लेते हैं।  मैं सरकार के इस निर्णय में उनके साथ हूँ।  मुझे खिचड़ी खाने के शौक हो ना हो लेकिन मुझे खिचड़ी पकाना बहुत पसंद है।  अब मैं खिचड़ी पकाते समय अपने पर गर्व कर सकूँगा कि मैंने राष्ट्रीय भोजन बनाया।  खिचड़ी बनाना अब अपने ध्वज़ को फहराने जैसा हो जायेगा।  अब गरीबों का खाना सरकारी रसोइयों में अधिकारिक रूप से पकेगा।  अच्छे दिन अपने साथ खिचड़ी लेकर आये हैं।